"अबला से सबला तक: साहस, संघर्ष और सशक्तिकरण की कहानी"
9 Mar, 2025
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भारतीय संस्कृति में महिलाओं की अत्यंत गौरवशाली और महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत ही एकमात्र देश है जहां महिलाओं के नाम के साथ देवी शब्द का प्रयोग किया जाता है। यहां नारी को शक्ति स्वरूपा, भारतीय संस्कृति की संवाहक, जीवन मूल्यों की संरक्षक, त्याग, दया, क्षमा, प्रेम, वीरता और बलिदान के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया है।ऐसी ही नहीं विद्वानों ने नारियों के लिए 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः' कहा है।
भारत में ही महिलाओं को गृहलक्ष्मी की संज्ञा दी जाती है, लेकिन आज के बदलते दौर में इन धारणाओं में परिवर्तन साफ दिखाई पड़ने लगा है।महिलाओं ने यह साबित किया है कि वे गृहलक्ष्मी होने तक ही सीमित नही हैं।पहले समाज में महिलाओं की स्थिति कमजोर हो गई थी। इसका प्रमुख कारण है निरक्षरता, लैंगिक भेदभाव, कुप्रथा और पुरुषवादी सोच,जिसके कारण महिलाएं घर की दहलीज तक सिमटकर रह गईं, लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं।
इक्कीसवीं सदी में भौतिकवादी परिवेश और बाजारवादी ताकतों के दबाव में नारी की छवि में तेजी से बदलाव हुआ है। इक्कीसवीं सदी में जितनी बड़ी संख्या में महिलाएं शिक्षक, इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक बनकर उच्च पदों पर पहुंचीं और रोजगार के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हुईं, वह अचंभित करने वाला है।
महिलाओं ने आईटी, प्रशासन, शिक्षा और विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी भागीदारी बढ़ाकर पहचान बनाई है। अब महिलाएं घर के चौके-चूल्हे तक सीमित नहीं,बल्कि सैन्य बलों में भी पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रही हैं। इससे महिला सशक्तीकरण की अवधारणा को समाज में स्थापित करने में मदद मिलेगी।
जब सेना में महिलाओं को मिला स्थाई कमीशन
आइए कहानी के माध्यम से आपको समझाते हैं। एक छात्रा रागिनी जो अभी नेशनल डिफेंस एकेडमी की तैयारी कर रही हैं। वो सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 17 फरवरी 2020 के फैसले को स्वागत योग्य बताती हैं। इसमें सेना की सभी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया। दरअसल ये फैसला 10 वर्षों के लंबे समय के इंतजार के बाद आया।
इस फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के वर्ष 2010 के फैसले को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुरुषों की तरह महिलाएं भी सेना में कमांड पोस्ट संभाल सकती हैं। यानी वह सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते समय अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि सामाजिक धारणाओं के आधार पर महिलाओं को समान अवसर न मिलना परेशान करने वाला है।
रागिनी ,सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लैंगिक समानता की ओर बढ़ता हुआ एक कदम बताती हैं। वे कहती हैं कि जब देश की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है फिर लिंग के आधार पर भेदभाव क्यों?
एक पूर्व सैन्य अधिकारी नाम न उजागर करने की शर्त पर कहते हैं कि अब तक ज्यादातर महिलाओं की भर्ती सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत होती थी, लेकिन अब उन्हें स्थायी कमीशन मिलेगा। इसका मतलब हैं कि महिला सैन्य अधिकारी भी पुरुषों के समान ही तब तक अपने पद पर कार्य कर सकेंगी जब तक वह रिटायर नहीं हो जातीं।
वायुसेना से रिटायर हो चुके आर तिवारी (बदला नाम) बताते हैं कि भारतीय सेना में पिछले कुछ समय में काफी संख्या में महिलाओं की भर्ती हुई है। महिला सैनिकों ने अपनी वीरता और देशभक्ति के जज्बे को साबित करके भी दिखाया है। इसी का परिणाम है कि आज महिला सैनिक लड़ाकू विमान भी उड़ा रही हैं। महिलाएं जोखिम भरे क्षेत्रों को भी सेवा और करियर के रूप में अपनाने लगी हैं।
तिवारी आगे बताते हैं कि आज देश की बेटियां किसी से कम नहीं हैं और उन्हें कमतर आंकने की भूल भी हमें नहीं करनी चाहिए। इसका एक जीता जाता उदाहरण यह है कि आजकल देश की बेटियां बड़ी संख्या में,पढ़ाई के साथ-साथ एनसीसी कैडेट के रूप में भी प्रशिक्षण ले रही हैं।
कोर्ट में सरकार ने क्या दलील दी थी
पेशे से वकील राधारमण बताते हैं कि महिलाओं को स्थायी कमीशन न देने के पीछे सरकार की यह दलील थी कि महिलाओं को सेना में कमांड पोस्ट नहीं दी जा सकती। सरकार ने इसका प्रमुख कारण शारीरिक क्षमता की सीमाओं और घरेलू दायित्वों को माना। सरकार ने ये भी कहा कि इसी कारण वे सैन्य सेवाओं की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगीं।
राधारमण सरकार की मंशा पर प्रश्न उठाते हुए कहते हैं कि सरकार दलीलें देते हुए शायद भूल गई कि देश की रक्षा करने के लिए नारी शक्ति ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया है। सैन्य बलों में महिलाओं की गौरवशाली भूमिका रही है।
वे वीर महिला सैनिकों का परिचय देते हुए कहते हैं कि पुनीता अरोड़ा को भारतीय नौसेना में पहली महिला लेफ्टिनेंट जनरल और पद्मा बंदोपाध्याय को भारतीय वायुसेना की पहली एयर वाइस मार्शल बनने का गौरव प्राप्त है। मेजर मिताली मधुमिता गैलेंट्री अवार्ड जीतने वाली पहली महिला हैं। मेजर मिताली ने ही काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान अदम्य साहस का परिचय दिया था।
शालिनी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में परास्नातक की छात्रा हैं। इनकी रुचि और बारीकी समझ रक्षा से जुड़े मामलों में है। वे महिलाओं पर होने वाले अन्याय और शोषण लिए हमेशा आवाज उठाती रहती हैं। शालिनी, सेना में महिलाओं की स्थिति को बताती हुई कहती हैं कि फिलहाल लगभग 14 लाख सशस्त्र बलों के 65 हजार अधिकारियों के कैडर में थलसेना में लगभग 1500 तो वहीं वायुसेना में 1600 और नौसेना में 500 महिलाएं शामिल हैं।
शालिनी सेना में महिलाओं के ऐतिहासिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कहती हैं कि अब यह संख्या बढ़ने की संभावना है। दरअसल भारतीय सेना में महिलाओं की नियुक्ति 1992 से शुरू हुई। उस समय पांच साल के लिए महिलाओं को नॉन मेडिकल क्षेत्र जैसे विमानन, रसद, कानून, इंजीनियरिंग और एक्जीक्यूटिव कैडर में नियुक्ति दी जाती थी। इसे पांच साल के लिए बढ़ाया जा सकता था।
वे बताती हैं कि वर्ष 2006 में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत महिला सैन्य अधिकारियों को 10 साल की सेवा की अनुमति दी गई। इसे चार साल तक और बढ़ाया जा सकता था। उल्लेखनीय है कि स्थायी कमीशन की मांग को लेकर वर्ष 2003 में महिलाओं ने कानूनी लड़ाई की शुरूआत की थी। इतने लंबे संघर्ष के बाद महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। यह देखकर लगता है कि हमारा देश भी अब प्रगति की ओर अग्रसर है।
रागिनी और शालिनी जैसी न जाने कितनी छात्राओं के लिए वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों में जंग लगे दरवाजे अब खुलने लगे है।इससे अब महिलाओं को लिंग के आधार पर बार-बार अपमानित नहीं होना पड़ेगा। ये ही सही मायनों में महिलाओं के लिए सामाजिक न्याय साबित होगा।
पत्रकार,भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली | वर्तमान में-दूरदर्शन @DDNational | पूर्व में- Sub Editor- दैनिक जागरण @inextlive |आकाशवाणी @Airnewshindi | @NBTLucknow | @swachhbharat
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